हौंसले की उड़ान


"गांव में हमने अपनी राइस मिल लगाई हैं उस से हमें रोज़ी मिल जाती हैआज हमें अपने घर को छोड़ कर काम धंधे की तलाश में महाराष्ट्र नहीं जाना पड़ता, हमारे बच्चें स्कूल जाते है। हम बारी बारी से काम करते हैं , अपना खेती का काम भी करते हैं और राइस मिल भी सँभालते हैं "

मीराबेन, काशीबेन और सीताबेन ने चर्चा के दौरान कही ये पंक्तियाँ ज़ेहन में गहराई तक जाती है। चेहरे पर पसीने की बूँदों के साथ इन महिलाओं की आँखों में आत्मविश्वास की चमक दिखाई देती हैं।





ये महिलायें दक्षिण गुजरात के आदिवासी विस्तार डांग जिले के छोटे से गांव गुंदवहल की है। हिन्द नर्मदा राइस मिल के नाम से इन महिलाओं का संयुक्त उपक्रम है। जिसमे मशीन के माध्यम से धान का छिलका निकालकर चावल बनाया जाता हैं साथ ही चावल, रागी, गेहूं आदि को चक्की में पिसा जाता हैं। वैसे तो ये आम चक्की है पर इस के पीछे एक असाधारण कहानी है इन साधारण आदिवासी महिलाओं के जुझारू उद्यमी बनने तक के सफर की।


गुंदवहल डांग जिले का एक गांव हैं जो महाराष्ट्र की सीमा से नजदीक हैं। लगभग १८० परिवारों के इस गांव में आजीविका का मुख्य साधन कृषि है यहाँ सिर्फ वर्षा आधारित खेती ही होती है इसलिए अधिकतर परिवार काम धन्धे के लिए महाराष्ट्र पलायन करते हैं। २०१४ में जब आगा खान ग्राम समर्थन कार्यक्रम (भारत) ने आजीविका संवर्धन करने की दिशा में काम शुरू किया तो प्रारम्भ में गांव के लोगो का सहकार न मिला। आजीविका संवर्धन एक मुख्य जरुरत थी और इसी दिशा में काम करते हुए महिलाओं से लगातार चर्चा कर उनके स्वसहायता समूहों को पुर्नर्जीवित किया गया।



हिन्द और नर्मदा दो समूहों में से १० महिलाओँ ने मिलकर हिन्द नर्मदा समूह बनाया। इन १० महिलाओं को खुद का कुछ काम शुरू करने की ललक थी। मूल दोनों समूहों में बचत और ऋण की सामान्य गतिविधियां चलती रही । हिन्द नर्मदा समूह की महिलाओं को रोजगार चाहिए था अतः उन्होंने २०१६ में राइस मिल लगाने का निर्णय लिया । गांव और नजदीक के क्षेत्र में कही भी धान से छिलका निकलने की मशीन नहीं थी अतः इस मशीन को लगाने से आवक होना सुनिश्चित था। वनविभाग ने कच्चा शेड बनाने के लिए मदद की और संस्था के सहयोग से मशीन आई तो राइस मिल शुरू की गई। किसी उद्यम को शुरू करने से ज्यादा चुनौतीपूर्ण उसे चलाना होता है। इन महिलाओं ने ज़मीन को लीज़ पर लेने से बिजली के थ्री फेज कनेक्शन तक सभी कामों के लिए दौड़ भाग की। मशीन में आई छोटी छोटी तकनीकी खामियों को ठीक करने तक सभी कुछ सीखा। समूह की प्रत्येक महिला बारी बारी से राइस मिल के रोजमर्रा के काम सँभालने लगी। चावल का भूसा मुर्गीपालन और ईंट के भट्टे वाले उद्योगों को बेचा जाता। आस पास कोई ऐसी चक्की न होने से २०१७ के अंत तक हिन्द नर्मदा राइस मिल का काम चलने लगा।


तभी २०१८ में मार्च - अप्रैल माह के एक दिन बवंडर ने पूरी राइस मिल को तहस नहस कर दिया। हवा के जोर से शेड के साथ मशीन भी क्षतिग्रस्त हो गई। तालुका विकास अधिकारी से लेकर राजनितिक दलों तक सभी को गुहार लगाई परन्तु कुछ सहयोग न मिला। गांव के लोगो ने सलाह दी की छोड़ दो अब ये मिल नहीं चला पाओगे। बिना पूंजी और सहयोग के फिर से राइस मिल खड़ी करना निश्चित ही चुनौतीपूर्ण था पर इन महिलाओं ने हिम्मत न हारी और छोटे छोटे प्रयास करती रही। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से ऋण लेकर मशीन ठीक कराई और स्वयं की बचतों से शेड को ठीक करना शुरू किया। इस प्रयास में ६-७ महीने लगे पर इनका जज्बा कायम रहा। कुछ अन्य लोगो से भी ऋण लिया और राइस मिल को २०१९ में फिर से शुरू किया। ये राइस मिल गांव के बाहर हैं अतः हर दिन समूह की एक महिला रात में मिल पर रूकती हैं। सभी महिलाओं ने अपने कार्य और जवाबदारियाँ बाँट रखी हैं। ये सयुंक्त उपक्रम है अतः आपसी मतभेद होते हैं परन्तु इन झगड़ों का निपटारा आपस में चर्चा करके किया जाता हैं।


राइस मिल का पुनः निर्मित शेड

इस राइस मिल को खड़ा करने में निश्चित ही आगा खान ग्राम समर्थन कार्यक्रम (भारत), वनविभाग ,राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन , पंचायत , ग्रामीणजन सभी का सहयोग है पर सबसे महत्वपूर्ण इन आदिवासी महिलाओं का जूनून और धैर्य है। ये महिलायें ज्यादा पढ़ी लिखी भी नहीं है परन्तु इन महिलाओं ने जहाँ से जो सहयोग मिल सका उसे लिया और अपना मार्ग खुद बनाया। ये हितग्राही प्रबंधन का बेहतरीन उदाहरण है। इन आदिवासी महिलाओं की कहानी बताती है कि यदि सब विभाग, संस्थाएँ मिलकर आजीविका संवर्द्धन की दिशा में कार्य करे तो बेहतर परिणाम मिलने की संभावनाएं बढ़ेंगी ।


आज भी हिन्द नर्मदा राइस मिल में कई समस्याएँ है। मिल बंद होने से इनके बंधे हुए ग्राहक चले गए, शेड को पूरी तरह पक्का करना है, ऋण चुकाने है , धंधे को और आगे बढ़ाना हैं। हालाँकि ये महिलायें हिसाब किताब रजिस्टर में तो लिखती है पर वित्तीय प्रबंधन , मार्केटिंग, व्यापार की योजना आदि तालीम की जरुरत है। पूंजी की कमी के चलते ये धान खरीद नहीं पा रहे। ये महिलाये धान खरीदकर अपनी मिल में चावल निकालकर पैकेट बनाकर बेचना चाहती है ।


पर इन सब के बावजूद चर्चा के दौरान उनके विचारों में स्पष्टता प्रतीत होती है। भविष्य की योजनाये बताते हुए उनके चेहरे पर असीम आत्मविश्वास झलकता है जो इस विश्वास को पक्का करता हैं कि ये महिलायें अपने उद्यम को आगे जरूर ले जाएँगी। ये ग्रामीण आदिवासी महिलायें विपरीत परिस्थितियों में भी समस्या का समाधान निकलना जानती है। अतः इनकी जिजीविषा को देखते हुए बरबस ही ये पक्तियाँ याद आ जाती है -


ये कैंचियां हमें उड़ने से क्या ख़ाक रोकेंगी , हम परों से नहीं हौसलों से उड़ा करते हैं

हिन्द नर्मदा समूह की महिलाओं के साथ सुश्री शुभा खड़के, इस लेख की लेखिका।

सुश्री शुभा  खड़के वर्त्तमान में इंस्टिट्यूट ऑफ़ रूरल मैनेजमेंट आणंद (IRMA)  के इनक्यूबेटर आईसीड  में इन्क्यूबेशन मैनेजर के पद पर कार्यरत है। वे पिछले लगभग १२  वर्षो से  ग्रामीण  विकास के क्षेत्र में कार्य कर रही है।  उन्होंने कई संस्थाओं में जैसे आगा खान ग्राम समर्थन कार्यक्रम (भारत) , अरावली , बेसिक्स में कार्य किया है। ग्रामीण उद्यमिता और जमीनी स्तर  के उद्यमियों की क्षमता वर्धन में उनकी विशेष रूचि है। आलेख में व्यक्त किये गए विचार उनके व्यक्तिगत हैं।

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